अंतरिक्ष यात्रियों में केमिकल लोचा, किसी को परियां दिखीं तो किसी को एलियंस!
मुंबई, बहुत से लोगों को इच्छा होती है कि काश, वे भी स्पेस अर्थात अंतरिक्ष की सैर कर पाते। टेस्लावाले एलन मस्क स्पेस टूरिज्म की योजना पर काम भी कर रहे हैं। पर जरा ठहरिए, स्पेस की सैर से आपके ब्रेन में केमिकल लोचा भी हो सकता है। हाल ही में हुई एक स्टडी में यह बात सामने आई है। स्टडी में यह बात सामने आई है कि ब्रेन में हुए इस केमिकल लोचे के बाद वहां से लौटे अंतरिक्ष यात्रियों में से किसी को परियां दिखीं तो किसी को एलियंस नजर आए। कुछ एस्ट्रोनॉट की तो आंखें भी कमजोर हो गईं।
अंतरिक्ष में जानेवाले यात्रियों का वहां से लौटने के बाद बुरा हाल हो जाता है। उनके दिमाग में तो केमिकल लोचा हो ही जाता है, उनका डीएनए भी बदल जाता है। ये खुलासा एक अमेरिकी रिसर्च से हुआ है।
बता दें कि दिमाग पर अंतरिक्ष के असर को समझने के लिए कई सारी स्टडीज लगातार हो रही हैं। ऐसी ही एक स्टडी अमेरिका में हुई, जो साल की शुरुआत में प्रâंटिअर न्यूरल सर्किट में ‘ब्रेन्स इन स्पेस- इफेक्ट ऑफ स्पेसलाइट ऑन ह्यूमन ब्रेन’ नाम से छपी। अध्ययन के तहत ऐसे १२ एस्ट्रोनॉट्स को लिया गया। स्पेस पर जाने से पहले उनकी ब्रेन इमेजिंग हुई और फिर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से लौटकर धरती पर फ्लाइट लेने से पहले उनकी जांच हुई। १० दिन बाद ये जांच दोबारा हुई। ये प्रक्रिया लगातार ७ महीनों तक चलती रही। अंतरिक्ष में रहने का मस्तिष्क पर क्या असर होता है, ये समझने के लिए एक खास तकनीक तैयार हुई, जिसे नाम मिला ट्रैक्टोग्राफी। ये ब्रेन इमेजिंग टेक्नीक है, जो न्यूरॉन्स में हल्के से हल्के बदलाव को दिखाती है। स्टडी में कई हैरतअंगेज बातें दिखीं। जैसे स्पेस पर पहुंचने पर वहां की बेहद खतरनाक रेडिएशन से बचने के लिए ब्रेन अलग तरह से काम करने लगता है। इसे न्यूरोप्लासिसिटी कहते हैं। ये दिमाग की वो क्षमता है, जो न्यूरॉन्स को क्लाइमेट या पर्यावरण में आए बदलाव के अनुसार काम करने के लिए प्रेरित करता है। लगभग ६ महीने भी वहां बिताने के बाद ब्रेन का ये सिस्टम कुछ इस तरह से री-वायर्ड हो जाता है कि धरती पर लौटना भी उसे बदल नहीं पाता। या बदलता भी होगा तो फिलहाल ये सामने नहीं आ सका है। स्पेस की एक्सट्रीम कंडीशन्स के कारण दिमाग अलग तरह से व्यवहार करने लगता है। जैसे वहां शरीर का भार खत्म हो जाता है। इस पर कंट्रोल के लिए ब्रेन अलग संकेत देता है, जो एक या दो दिन नहीं, कई महीनों तक चलता है। ब्रेन की री-वायरिंग के लिए इतना समय काफी है।
