रेलवे को ८१५ करोड़ की कमाई!
मुंबई : देशभर में सबसे ज्यादा भंगार यदि किसी सरकारी संस्थान में निकलता है तो वह है भारतीय रेलवे। हर साल भारतीय रेलवे कम से कम ४,५०० करोड़ रुपए का स्व्रैâप बेचनेवाली रेलवे ने पिछले साल ‘जीरो स्क्रैप’ पॉलिसी बनाई थी। ट्रैक के आसपास पड़ी पुरानी पटरियां, रेलवे के कंडेम हुए डिब्बे आदि भंगार बेचकर पश्चिम रेलवे ने एक नया मुकाम हासिल किया है। वहीं मध्य रेलवे भी भंगार बेचने के मामले में पश्चिम रेलवे के नक्शे कदम पर चल रही है। इस बार मध्य रेलवे ने भंगार की कमाई में इजाफा किया है। पश्चिम और मध्य रेलवे ने कुल मिलाकर २०१९-२० में ८१५ करोड़ रुपये का कबाड़ बेचा है, जिसमें पश्चिम रेलवे अव्वल साबित हुई है।
बता दें कि पश्चिम रेलवे ने जीरो स्व्रैâप पॉलिसी के तहत ५०५.२३ करोड़ रुपए की कमाई भंगार बेचकर की है जबकि मध्य रेलवे ने ३१०.४९ करोड़ रुपए का भंगार बेचा है। जानकारी के मुताबिक पश्चिम रेलवे ने पटरियों के आसपास पड़े स्व्रैâप की पहचान करने के लिए डिविजन और मुख्यालय स्तर के अधिकारियों को तैनात किया है। इन अधिकारियों ने जिस अवस्था में भंगार मिला उसे ई-नीलामी की प्रक्रिया से जोड़कर बेचना शुरू किया। पश्चिम रेलवे के महालक्ष्मी ईएमयू वर्कशॉप को देश का पहला ‘जीरो स्व्रैâप’ वर्कशॉप घोषित किया गया। पहले स्क्रैप के कारण वर्कशॉप में काम करने में भी अड़चनें होती थीं।
ऐसे बढ़ा भंगार
भारतीय रेलवे ने पुराने आईसीएफ कोच बनाने बंद कर दिए हैं। अब लंबी दूरी की ट्रेनों के लिए राजधानी टाइप एलएचबी कोच की खेप आने लगी हैं, इसके बाद पुराने डिब्बों को नीलाम किया जा रहा है। पुराने कोच की उम्र २५ साल है, नए कोच की उम्र ४० साल होगी। इसी तरह, देशभर में ट्रैक की ताकत बढ़ाने के लिए पटरियों को बदला जा रहा है, इससे भी काफी मात्रा में पुरानी पटरियों को सिस्टम से हटाया जा रहा है। इन पटरियों की उम्र ट्रैफिक क्षमता के मुताबिक तय होती है। मुंबई में उपनगरीय रेलवे में सबसे ज्यादा ट्रैफिक होने के कारण यहां पटरियों को अन्य जोन के मुकाबले जल्दी बदला जाता है।
