पुलिस की लाठी में होती है आवाज़, जानिए और क्या क्या हैं राज़
पुलिस की मार और लाठी के वार से कौन खौफ नहीं खाता. लाठी लेकर चलता पुलिसवाला अच्छे अच्छों की चाल सीधी कर देता है. इस लाठी में कई चमत्कार हैं. पुलिस की लाठी टूटती नहीं है. जिसपर पड़ जाए उसकी राजनीति चमक जाती है. पहलवान को भी जवानी में पड़ी लाठी बुढ़ापे की सर्दियों तक दर्द देती है. ऐसी कितनी ही धारणाएं हैं लाठी के बारे में. तो चलिए, आज कहानी सुनाते हैं लाठी की. पुलिस की लाठी की. किसी कर्नल का डंडा नहीं, संघ का दंड नहीं, हरवाहे की लग्घी नहीं... पुलिस की लाठी. इसके पुलिस का हथियार बनने की शुरुआत से आधुनिक और फैशनेबुक होने तक का सफर.
देश में भर में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. इस दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने और भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस लाठी चार्ज कर रही है. लाठियां भांजकर ही भीड़ को नियंत्रित किया जाता है. एक से एक अत्याधुनिक हथियार होने के बावजूद लाठी यानी बेंत का इस्तेमाल पुलिस ज्यादा करती है. पुलिस की बेंत कोई आम लाठी नहीं होती. बल्कि इसे विशेष रूप से बनाया जाता है. यही नहीं इसे चलाने के लिए बकायदा पुलिसकर्मियों से लेकर अफसरों तक को ट्रेनिंग भी दी जाती है.
जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, तो वे भारतीयों पर बहुत जुल्म ज्यादती करते थे. कर वसूलने के लिए हर तरीका इस्तेमाल करते थे. स्वतंत्रता संग्राम में शामिल लोगों की भीड़ को काबू करने के लिए लाठी डंडों का इस्तेमाल करते थे. तभी से लाठी का चलन पुलिस में आया. इसे बनाने के लिए ठोस लकड़ी नहीं बल्कि लचीली बेंत का इस्तेमाल होता था. उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और वर्तमान में यूपीएससी के सदस्य आलोक प्रसाद बताते हैं कि पुलिस में बेंत का इस्तेमाल ब्रिटिशकाल से ही होता आया है. बेंत लचीला होता है. इसके वार से फ्रैक्चर नहीं होता. इसका मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं होता. उद्देश्य ये होता है कि चोट लगे लेकिन इससे बड़ा नुकसान ना हो. इसे पुलिस का एक मानवीय पहलू भी कह सकते हैं.
मुरादाबाद पुलिस अकादमी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि बेंत यानी लाठी चलाना भी राइट कंट्रोल ड्रिल का एक अहम पार्ट होता है. पुलिस अकादमी में सभी पुलिसकर्मियों को बकायदा इसकी ट्रेनिंग दी जाती है. लाठी ड्रिल के दौरान इस बात का ख्याल रखा जाता है कि बेंत इंसान के शरीर पर किसी ऐसे हिस्से पर ना पड़े, जहां उसे गंभीर चोट लग सकती हो. अक्सर धड़ से नीचे पैरों के पीछे की तरफ लाठी मारी जाती है. असली उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना ही होता है. उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आईपीएस अधिकारियों को भी बेंत चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है.
